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समस्याएं जो मध्यप्रदेश के लिए 'कलंक’, देश के चुनाव में नहीं बन पाती मुद्दा

श्योपुर। आदिवासी बाहुल्य और विकास के हर पैमाने में पिछड़े श्योपुर की किस्मत ही अजीब है। यहां हर साल कुपोषण से होने वाली मौतों पर विपक्षी दल हंगामा तो खूब मचाते हैं, लेकिन प्रदेश के इस 'कलंक" को किसी भी चुनाव में मुद्दा नहीं बनाते। बेरोजगारी, रोजगार के लिए पलायन, पेयजल संकट की गंभीर स्थिति भी चुनावों में मुद्दा नहीं बनती। देश और प्रदेश में श्योपुर की पहचान कुपोषण से होती है। समय-समय पर कुपोषण से बच्चों की मौत के मामले सामने आते रहते हैं। 2011 में वीरपुर क्षेत्र में कुपोषण से 32 बच्चों ने दम तोड़ा तो पूरे देश में हंगामा मच गया। बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष ने वीरपुर में आकर जांच की, लेकिन 2014 के लोसकभा चुनाव में कुपोषण पर किसी दल या नेता ने बात नहीं की।
नतीजा चुनाव के दो साल बाद 2016 में तीन महीने के अंतराल में कुपोषण से ग्रस्त 55 से ज्यादा बच्चों ने दम तोड़ दिया। महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार श्योपुर में 18 हजार 324 बच्चे कुपोषित हैं। 3 हजार 134 बच्चे अतिकुपोषित, 270 गंभीर कुपोषण की चपेट में हैं। बावजूद इस सबके इस बार भी चुनाव में कुपोषण पर कोई भी राजनीतिक दल बोलने को तैयार नहीं है।
बेगारी और पलायन : श्योपुर जिले में ऐसा कोई उद्योग नहीं जो 20 युवाओं को भी रोजगार देता हो। बेगारी इस कदर हावी है कि वीरपुर, विजयपुर क्षेत्र के 80 फीसदी युवा रोजगार के लिए महानगरों में पलायन कर गए हैं। कराहल क्षेत्र में हर साल गर्मी आने से पहले 70 से 80 हजार आदिवासी रोजगार के लिए कोटा, जयपुर से दिल्ली तक पलायन कर जाते हैं। लेकिन किसी भी लोकसभा चुनाव में किसी प्रत्याशी ने रोजगार बढ़ाने और पलायन को रोकने की ठोस प्लानिंग पर बात तो दूर झूठा वादा भी नहीं किया।
पी रहे नदी-तालाबों का दूषित पानी : कराहल और विजयपुर क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या पीने का पानी है। सैकड़ों गांवों में गर्मी के दिनों में पेयजल 'दुर्लभ' हो जाता है। विजयपुर कस्बे में ही तीन से चार दिन में एक बार पेयजल सप्लाय होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालत यह है कि आदिवासी व गरीब परिवार तालाब व नदियों का दूषित पानी पीते हैं और इसी कारण बीमारियां फैलती हैं। चार महीने पहले अगरा व वीरपुर क्षेत्र में बरसाती नदी के पानी से फैले डायरिया के कारण 12 बच्चे, 02 महिला व 03 बुजुर्गों की मौत हुई थी।
इन पर भी नेताजी रहते हैं मौन
- कूनो सेंचुरी में गुजरात से एशियाई सिंह लाए जाने थे। सुप्रीम कोर्ट केंद्र व गुजरात सरकार को इस मामले में फटकार लगा चुका है। विधानसभा चुनाव से पहले तक मप्र, गुजरात व केंद्र में सरकार भाजपा की थी, लेकिन सिंहों को यहां नहीं लाया जा सका। यदि सिंह आते तो क्षेत्र में पर्यटन का ही विकास होता। रोजगार की भी संभावना बढ़ती।
श्योपुर-ग्वालियर नैरोगेज लाइन को ब्रॉडगेज में बदलने की मांग 40 साल से चल रही है। 2010 में केंद्र सरकार ने मंजूरी दी। मोदी सरकार ने पुरानी मंजूरी को रद्द करके 2015 में फिर योजना को मंजूरी दी। सर्वे व भूमि अधिग्रहण के नाम पर 04 साल से कागजी घोड़े दौड़ रहे हैं।
- विजयपुर की सड़कें 10 साल से जर्जर हैं। चार साल पहले ठेका हो गया, लेकिन निर्माण नहीं होता। 50 किमी का सफर एक घंटे में पूरा हो जाता है, लेकिन विजयपुर की धोविनी-टेंटरा रोड का सफर साढ़े तीन घंटे में पूरा होता है। 10 साल में इस रोड पर सड़क हादसे में इतनी मौतें हुई हैं जितनी ग्वालियर-चंबल संभाग किसी भी अन्य बड़े हाईवे पर नहीं हुई होंगी।
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