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झटकों के बावजूद तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था बना रहा भारत

नई दिल्ली। पिछले साल कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी और व्यापार युद्ध जैसी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेज विकास वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बनी रही। देश की विकास दर में हालांकि इस दौरान काफी उतार-चढ़ाव भी देखा गया, लेकिन यह सात फीसद से ऊपर बनी रही।
जनवरी-मार्च तिमाही में देश की विकास दर 7.7 फीसद रही, उसके बाद अप्रैल-जून तिमाही में विकास दर 8.2 फीसद और जुलाई-सितंबर तिमाही में यह 7.1 फीसद रही। इस बीच ब्याज बढ़ने और नकदी की उपलब्धता घटने के कारण फिच रेटिंग ने चालू वित्त वर्ष में देश की विकास दर के अपने अनुमान को 7.8 फीसद से घटाकर 7.2 फीसद कर दिया।
नीति आयोग के वाइस चेयरमैन राजीव कुमार के मुताबिक नए साल में सरकार का ध्यान विकास दर में तेजी लाने के लिए सुधार की गति को तेज करने पर रहेगा। नए साल में भारत की विकास दर 7.8 फीसद रहेगी। इस दौरान निवेश में और तेजी आएगी और निजी निवेश बढ़ेगा। विशेषज्ञों का हालांकि मानना है कि विकास दर में गिरावट को देखते हुए सरकार अगले आम चुनाव से पहले खर्च बढ़ाने को बाध्य हो सकती है और इसके कारण वित्तीय स्थिति दबाव में आ सकती है।
तेल कीमत में अचानक बढ़ोतरी (जिसमें अब काफी गिरावट आई है), डॉलर में मजबूती, अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में गिरावट और सालभर में ही फेडरल रिजर्व (अमेरिकी केंद्रीय बैंक) द्वारा चार बार ब्याज दर बढ़ाने का नकारात्मक असर 2018 में भारत की अर्थव्यवस्था पर रहा।
गत वर्ष बैंकिंग सेक्टर सुर्खियों में रहा। साल के शुरू में सबसे बड़ा बैंकिंग घोटाला सामने आया। 14 फरवरी को पंजाब नेशनल बैंक ने कहा कि उसे 11,400 करोड़ रुपए के एक घोटाले का पता चला है। इस घोटाले में अरबपति ज्वेलर नीरव मोदी की संलिप्तता थी।
गत साल 77,417 करोड़ रुपए का रिकॉर्ड विनिवेश
सरकार ने गत साल सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी का विनिवेश कर रिकॉर्ड 77,417 करोड़ रुपए कमाए। इस दौरान सरकार ने विनिवेश लक्ष्य हासिल करने के लिए कंपनियों के विलय का एक नया तरीका भी अपनाया। सरकार के विनिवेश कार्यक्रमों में प्रमुखता से शामिल रहे एचपीसीएल का ओएनजीसी द्वारा अधिग्रहण, सीपीएसई ईटीएफ, भारत-22 ईटीएफ और कोल इंडिया की हिस्सेदारी बिक्री। इसके अलावा छह प्रारंभिक पब्लिक ऑफर (आइपीओ) भी लाए गए। इस बीच एयर इंडिया की 74 फीसद हिस्सेदारी बेचने की सरकार की योजना परवान नहीं चढ़ पाई।

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