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'तेल की धार' पर टिका अर्थव्यवस्था का भविष्य, जानिए क्या कहता है 2019 का अनुमान

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों की अनिश्चितताओं से निटपने के लिए भारत में पेट्रोल-डीजल के दामों में रोज-रोज बदलाव का सिलसिला जारी है। हालांकि, यह व्यवस्था किसी के लिए भी आसान नहीं है, खासतौर पर मध्यम वर्ग के लिए तो बिल्कुल नहीं, जिसे इस तरह बार-बार कीमतों में बढ़ोतरी की आदत नहीं है। मध्यम वर्ग पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर बहुत संवेदनशील है। हो भी क्यों न? आखिर इन कीमतों का सीधा असर दूसरी चीजों पर पड़ता है और नतीजन महंगाई भी बढ़ती-घटती है।
मौजूदा कीमतों के मायने
पिछले कुछ महीनों से कच्चे तेल की कीमत 55 से 65 डॉलर प्रति बैरल के बीच बनी हुई है। इसी बीच, ओपेक यानि ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज में शामिल कुछ तेल उत्पादक देशों ने आपूर्ति में कटौती कर कच्चे तेल को बीते कुछ हफ्तों में अपना मजबूत बेस बनाए रखने में मदद की है। इसमें रूस जैसे बड़े गैर-ओपेक तेल उत्पादक देश ने भी सहयोग किया है। ओपेक देशों द्वारा उत्पादन में कटौती से कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता में कमी आएगी और एक स्थिर सीमा पर इसकी ट्रेडिंग होती रहेगी। वहीं दूसरी तरफ, अमेरिका कच्चे तेल का लगातार उत्पादन बढ़ा रहा है और 2019 में उत्पादन का आंकड़ा नई ऊंचाई तक पहुंचने की उम्मीद है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में स्थिर रखने में परेशानी आएगी।
तेल उत्पादन पर अमेरिकी रणनीति
अमेरिका अपने यहां ईंधन के वैकल्पिक उपायों जैसे इथेनॉल के इस्तेमाल में तेजी ला रहा है, वहीं शेल ऑयल (पत्थरों से निकाला जाने वाला तेल) का उत्पादन भी बढ़ा रहा है। सवाल उठता है कि तेल की कीमतें ऐतिहासिक रूप से कम होने के बावजूद अमेरिका इसका उत्पादन बढ़ाने पर आमादा क्यों है? कई शेल ऑयल उत्पादक अब ज्यादा मात्रा में तेल निकालने लगे हैं। उन्होंने तेल कुओं को हमेशा चालू रखने का तरीका खोज लिया है। इसी तरह, खाड़ी देशों के कुएं भी बड़ी मात्रा में कच्चा तेल उगल रहे हैं। यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमत कम होने के बाद भी उत्पादन नहीं घटाया जा सका है। इन सबके परिणामस्वरूप, बड़े पारंपरिक तेल उद्यमों ने नए भंडार की खोज बंद कर दी है।
मिडिल ईस्ट के महत्वपूर्ण आंकड़े
2019 के पहले हफ्ते के लिए मिडिल ईस्ट से कच्चे तेल का निर्यात 4.28 मिलियन बैरल बढ़ते हुए 122.38 मिलियन बैरल तक पहुंच गया है। निर्यात में अमीरात ने सबको पछाड़ दिया, वहीं यूएई, सऊदी अरब और ओमान का निर्यात भी पहले से ज्यादा रहा। दिसंबर 2018 तक वेनेजुएला में तेल उत्पादन 1.2 मिलियन बैरल प्रति दिन था, जो 2003 में उसके सबसे कम उत्पादन के आंकड़े के करीब रहा। 2003 में हड़ताल के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ था। 2019 में वेस्ट टैक्सस में उत्पादन 2 मिलियन बैरल प्रति दिन तक बढ़ जाएगा।
30 डॉलर पर भी मुनाफा
अमेरिकी कंपनियों के पास कच्चे तेल के 1.14 लाख कुएं हैं और इनमें से कई कंपनियां 30 डॉलर प्रति बैरल का भाव रहने पर भी मुनाफा कमा सकती हैं। अमेरिका में बीते कुछ दिनों से शटडाउन जारी है। इससे आशंका खड़ी हो गई है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस प्रस्ताव पर समय रहते काम शुरू नहीं हो पाएगा, जिसमें ऑफशोर ड्रिलिंग की बात कही गई है, ताकि गर्मी के महीनो में गैसोलीन में इथेनॉल के उच्च स्तर की अनुमति प्रदान की जा सके। अमेरिकी ऊर्जा फर्मों ने तीन हफ्तों में पहली बार तेल स्रोतों में कमी की है, क्योंकि उत्पादकों ने कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखते हुए 2019 की अपनी ड्रिलिंग योजनाओं में कमी करना शुरू कर दिया है।
ड्रिलर्स ने जनवरी के पहले सप्ताह में आठ तेल स्रोतों को बंद कर दिया है, जिससे इनकी कुल संख्या घटकर 877 आ गई है। दूसरी ओर लीबिया ने 2021 तक अपना तेल उत्पादन दोगुना यानी 2.1 मिलियन बैरल प्रति दिन करने का लक्ष्य रखा है, क्योंकि गृह युद्ध झेल रहे इस देश में अब स्थिरता आने लगी है। वर्तमान में लिबिया का तेल उत्पादन 9,53,000 बैरल प्रति दिन है, जबकि गृह युद्ध से पहले इसकी क्षमता 1.6 मिलियन बैरल प्रति दिन थी।
कीमतों में ऊंच-नीच का कारण
तेल की कीमतों में अस्थिरता का एक अहम कारण कमोडिटी की आपूर्ति का उतार-चढ़ाव रहा है। 10 मई, 2018 को कीमतें बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गईं। यह अमेरिका द्वारा ईरान परमाणु समझौते तोड़ने और उस पर प्रतिबंध लगाने के दो दिन बाद हुआ। इससे पहले 20 जनवरी 2016 को तेल की कीमतें 13.55 डॉलर प्रति बैरल के 13 साल के निचले स्तर पर आ गई थीं और आज उपरोक्त सभी कारणों से तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है। इससे पहले तेल की कीमतों में एक अनुमानित मौसमी उतार-चढ़ाव होता था।
निगाहें सऊदी अरब और चीन पर
जहां तक ​​डाटा का सवाल है, प्रचुर आपूर्ति और मांग की अनिश्चितता के कारण तेल बाजारों को लेकर कुछ भी कहना बहुत मुश्किल है। ऐसा लगता है कि तेल बाजार अभी आपूर्ति में आक्रामक कटौती के सऊदी अरब के फैसले और चीन के हालात पर नजर रख रहा है। चीन के केंद्रीय बैंक ने रिवर्स रेपो ऑपरेशन्स के माध्यम से अपने सबसे बड़े दैनिक नेट कैश इंजेक्शन की घोषणा की। यह इस बात का प्रमाण है कि चीन मंदी से उबरने के लिए नीतियों में ढील दे रहा है।
ट्रेड वॉर के कारण अनिश्चितता
अगर चीन और अमेरिका का ट्रेड वॉर सुलझ जाए, तो कच्चे तेल की कीमत स्थिर हो सकती है। साथ ही चीन की अर्थव्यवस्था में फिर से तेजी आ जाए। दूसरी तरफ, ब्रेक्सिट मुद्दा अभी हल होता नजर नहीं आ रहा है। वास्तव में एक प्रतिकूल परिणाम दुनिया भर में मंदी का नया दौर ला सकता है। वहीं, लग रहा है कि अमेरिका एक बार फिर ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा सकता है। जिन देशों को अमेरिका से छूट मिली थी, वे ईरान से एक निश्चित मात्रा में तेल का आयात जारी रखने के लिए तैयार हैं और अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन कर रहे हैं।
तेल में निवेश इन बातों पर निर्भर
मौजूदा हालात में निवेशकों को व्यापक आर्थिक पहलुओं पर विचार करना होगा और यह भी मानना ​​होगा कि 2019 में भी कच्चे तेल की मांग अनिश्चित रहने की आशंका है क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी विभिन्न समस्याओं से जूझ रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी वैश्विक आर्थिक विकास के अपने अनुमान में 3.9% से 3.7% की कटौती की है। यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी का सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है। मंदी की यह आग तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव से और भड़क सकती है। हम उम्मीद करते हैं कि अगले कुछ महीने और कच्चे तेल को लेकर गिरावट का दौर बना रहेगा और इसके बाद यह 50-65 डॉलर प्रति बैरल पर बना रहेगा।
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