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CG Chunav 2018: चुनाव चिह्न के चक्रव्यूह में फंसा जोगी का राजनीतिक वजूद

बिलासपुर  । आप इसे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के प्रति जनता का प्रेम कह लें या उनके डर का प्रभाव, पूरे मरवाही विधानसभा क्षेत्र में घूम लीजिए उनके खिलाफ खुलकर बोलने वाले नहीं मिलेंगे। ऐसा नहीं है कि मरवाही में विकास की गंगा बह रही है।
इस आदिवासी बहुल विधानसभा क्षेत्र में तमाम तरह की समस्याएं हैं। सड़कें खराब हैं। स्कूलों में शिक्षकों की कमी है। डॉक्टरों एवं आधारभूत संरचना के अभाव में अस्पताल रेफर सेंटर बन गए हैं। कृषि को छोड़ रोजगार के कोई व्यवस्थित साधन नहीं है। सिंचाई की समुचित व्यवस्था न होने के कारण कृषि भी प्रकृति पर निर्भर है।
बावजूद जोगी परिवार का मरवाही विधानसभा क्षेत्र पर 18 वर्षों से कब्जा है। जोगी एक बार फिर मरवाही के अखाड़े में अपना भाग्य आजमाने उतरे हैं लेकिन अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंस गए हैं। वे चक्रव्यूह भेद पाते हैं या नहीं यह तो 11 दिसंबर को मतगणना के दौरान ही पता चलेगा।
बिलासपुर-पेंड्रा-मनेंद्रगढ़ मुख्य मार्ग पर कारीआम से छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश की सीमा भेड़वा नाला तक सड़क के दोनों किनारे स्थित दुकान-मकान गुलाबी झंडे से पटे पड़े हैं। यह गुलाबी झंडा अजीत जोगी द्वारा बनाई गई पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ का है। बैनर और झंडों के जोर को देखकर कहा जा सकता है कि यहां भाजपा और कांग्रेस पर जोगी भारी हैं। लेकिन, हकीकत में ऐसा है नहीं।
भाजपा की प्रत्याशी अर्चना पोर्ते और कांग्रेस प्रत्याशी गुलाब सिंह राज को कम आंकना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए कि कांग्रेस छोड़ खुद की पार्टी जकांछ बनाकर चुनावी मैदान में 'हल जोतता हुआ किसान' चुनाव चिन्ह गांव-देहात के मतदाताओं तक पहुंचाना जोगी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य सृजन के बाद राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने जोगी कांग्रेस से मरवाही विधानसभा उप चुनाव-2001 जीतकर छत्तीसगढ़ विधानसभा में पहुंचे। उन्होंने मरवाही से कांग्रेस के टिकट पर 2003 और 2008 में विधानसभा चुनाव जीता। 2013 में जोगी ने चुनाव नहीं लड़ा। उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर अपने बेटे अमित जोगी को मरवाही के मैदान में उतारा। अमित ने कब्जा बरकरार रखा।
सीधे कहें तो मरवाही के मतदाताओं और कांग्रेस के बीच मोहब्बत रही है। यह मोहब्बत ही अजीत जोगी के लिए चक्रव्यूह बन गया है। 1972 में मरवाही विधानसभा के अस्तित्व में आने के बाद से 2013 तक हुए 11 विधानसभा चुनाव में अपवाद स्वरूप सिर्फ दो बार 1990 और 1998 में भाजपा की जीत हुई है। इस क्षेत्र के सुदूर आदिवासी अंचल के मतदाता जोगी के साथ-साथ कांग्रेस के चुनाव चिन्ह हाथ को जानते और पहचानते हैं। इनके बीच जोगी अगर अपना चुनाव चिन्ह पहुंचा सके तो ठीक नहीं तो मरवाही में इनकी राजनीति की कहानी खत्म हो सकती है।
पतगंवा में सड़क के किनारे अपने घर के सामने बैठे बुजुर्ग पूरण दास कहते हैं-जोगी जब मुख्यमंत्री रहिस तो ठीक काम करे रहिस तउन से ऊजीतत रहिस। ऐही कारण से ओखर लड़का का भी जीता दिहिन। लेकिन, इस बार देखे क पड़ही। मरवाही में बकरी एवं गाय को चराने वाले हर तरफ दिख जाते हैं। उन्हें झुंड में अपनी बकरियों और गायों की संख्या दूर से ही गिन लेने की महारत हासिल है लेकिन अबकी किसकी जीत होगी, के सवाल पर चुप्पी साध लेते हैं। कोटा के जंगल में बकरी चरा रहे गोपाल सिंह एवं उनके साथी बाल सिंह ने बहुत जोर देने पर कहा कि अबकी मुकाबला कमल और पंजा छाप के बीच लगता है।
गौरेला के वार रूम से जोगी लड़ रहे लड़ाई
अजीत जोगी खुद मारवाही से चुनाव लड़ने के साथ-साथ अपनी पत्नी रेणु जोगी को बगल की सीट कोटा से लड़ा रहे हैं। जबकि पुत्रवधू ऋचा जोगी को अकलतरा से बसपा के टिकट पर चुूनाव लड़ा रहे हैं। इसके साथ ही उनके कंधे जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाने की भी जिम्मेवारी है। उन्होंने मरवाही विधानसभा क्षेत्र के गौरेला को वाररूम बना रखा है। जोगी दिन के 11-12 बजे तक गौरेला में रहते हैं। फिर हेलिकॉप्टर से राज्य के दूसरे क्षेत्रों में प्रचार के लिए उड़ जाते हैं और शाम को चार-पांच बजे वापस गौरेला में लैंड करते हैं।
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