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अंतरराष्ट्रीय एजेंसी FATF ने पाकिस्तान में आतंकी फंडिंग की जांच शुरू की

नई दिल्ली। आतंकी फंडिंग रोकने के दावों की जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसी एफएटीएफ की टीम पाकिस्तान पहुंच गई है। यह टीम पाकिस्तान में रुककर जमीनी सच्चाई का पता लगाएगी। पाकिस्तान पहले से ही एफएटीएफ की निगरानी सूची में डाल रखा है और यदि इस इस्लामाबाद टीम को संतुष्ट नहीं कर पाया तो उसके काली सूची में डाले जाने का खतरा बढ़ जाएगा।
इससे आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद हासिल करना और भी मुश्किल हो जाएगा। पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) के एशिया पैसिफिक ग्र्रुप की नौ सदस्यीय टीम सोमवार को पाकिस्तान पहुंच गई है। यह टीम 12 दिन तक पाकिस्तान में रहेगी और आतंकी फंडिंग रोकने के लिए किए गए उपायों की जमीनी हकीकत की जांच करेगी।
टीम में अमेरिकी वित्त विभाग, ब्रिटिश स्कॉटलैंड यार्ड, मालदीव के फाइनेंसियल इंटेलीजेंस, इंडोनेशिया के वित्त विभाग, चीन के पीपुल्स बैंक और तुर्की के जस्टिस विभाग के विशेषज्ञ शामिल हैं। टीम की रिपोर्ट के आधार पर ही पाकिस्तान को निगरानी सूची में बनाए रखने या फिर काली सूची में डालने पर फैसला होगा। आर्थिक संकट से निकलने के लिए पाकिस्तान को पहले एफएटीएफ की निगरानी सूची से निकलना जरूरी होगी।
भारतीय एजेंसियों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसी को संतुष्ट करना उसके लिए आसान नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि फरवरी में जब पाकिस्तान को निगरानी सूची में डालने का नोटिस जारी किया गया था, तब से इस्लामाबाद ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
सबसे अहम बात यह है कि दुनिया भले ही लश्कर ए तैयबा प्रमुख हाफिज सईद, जैश ए मोहम्मद सरगना मसूद अजहर समेत तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के कई बड़े आतंकियों को आतंकी मानती हो, लेकिन पाकिस्तान इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। यही नहीं संयुक्त राष्ट्र से अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित हाफिज सईद को तो राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने की इजाजत दे दी जाती है।
भारतीय एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार आतंकी फंडिंग पर पाकिस्तान के दावों और हकीकत में अंतर साफ देखा जा सकता है। निगरानी सूची में डाले जाने के बाद पाकिस्तान ने कानून में संशोधन कर संयुक्त राष्ट्र की सूची में शामिल सभी आतंकियों को अपनी आतंकी सूची में डाल दिया।
लेकिन हकीकत यह है कि पाकिस्तान में आतंक के खिलाफ कार्रवाई के लिए बनी सबसे बड़ी एजेंसी नेशनल काउंटर टेररिज्म एजेंसी (नाकटा) की सूची में न तो जमात उद दावा का नाम है और न ही फलाह-ए-इंसानियत का। नाकटा ने इन्हें केवल निगरानी सूची में डाल रखा है। जबकि ये दोनों लश्कर ए तैयबा के फ्रंटल संगठन है और संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंधित सूची में शामिल है।
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