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झाबुआ में पलायन करने वालों की गिनती, ताकि चुनाव में वोट डालने आ सकें

झाबुआ। विधानसभा चुनाव के लिए पहली बार जिले से मजदूरी के लिए पलायन कर गए वोटरों की गिनती की जाएगी। कलेक्टर आशीष सक्सेना ने ग्राम पंचायत सचिवों, रोजगार सहायकों और पंचायत समन्वयक अधिकारियों को एक फॉर्मेट दिया है। इसमें हर गांव से गए वोटरों का नाम, जाने वाली जगह और वे जिस नियोक्ता के यहां काम कर रहे हैं, उनका नाम और मोबाइल नंबर रहेगा। ज्यादा से ज्यादा वोटरों को वापस लाने के लिए यह कवायद की जा रही है।
दरअसल, झाबुआ जिले में पलायन कम वोटिंग का बड़ा कारण बन सकता है। डेढ़ से दो महीने में पलायन पर जाने वालों की तादाद में काफी इजाफा हुआ है। वैसे भी अमूमन 15 से 20 प्रतिशत आबादी पूरे साल पलायन पर होती है। अभी की स्थिति में यह माना जा सकता है कि जिले से 30-35 प्रतिशत लोग काम के लिए बाहर गए हैं।
कई गांवों में स्थिति यह है कि घरों में सिर्फ बुजुर्ग और बच्चे बचे हैं। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में झाबुआ विधानसभा में सिर्फ 54 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। कलेक्टर सक्सेना ने शनिवार को हुई बैठक में बताया कि अंचल में रोजगार के साधन उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि आदिवासी बंधु चुनाव प्रक्रिया के दौरान अपने घर-परिवार में ही रहें।
यह होगी कोशिश
जो लोग पलायन पर गए हैं, उनसे संपर्क कर वोटिंग के लिए आने को कहा जाएगा, साथ ही नियोक्ताओं पर भी दबाव बनाया जाएगा। झाबुआ एसडीएम जगदीश गोमे ने बताया कि नियोक्ताओं को पत्र भेजकर कहेंगे कि मतदान वाले दिन वे कर्मियों को छुट्टी दें।
असर क्या होगा?
हालांकि इस कवायद से खास असर होने की उम्मीद नहीं है। नियोक्ता एक दिन के लिए अवकाश दे भी दे तो यहां तक पहुंचना आसान नहीं है। मजदूर गुजरात, राजस्थान और दूसरे राज्यों में काफी दूर तक हैं।
फिर क्या होगा?
कुल मिलाकर पलायन पर गए लोगों को कोई ला सकता है तो वे हैं राजनीतिक दल और उनके प्रत्याशी, लेकिन इसकी शर्तें भी अलिखित रूप से आने वालों और बुलाने वालों के बीच तय हैं। मजदूरी और दूसरे वादे पूरे करने होते हैं। इस बार निर्वाचन आयोग भी खर्च पर कड़ी नजर रखेगा। प्रत्याशी या कार्यकर्ता मतदाता को अपने वाहनों से लाता है तो इसका खर्च चुनावी खर्च में शामिल हो जाएगा।
फैक्ट फाइल
झाबुआ : जिले की जनसंख्या- 10 लाख 25 हजार 48 (2011 की जनगणना अनुसार)
वोटरों की संख्या- 7 लाख 46 हजार 894
पलायन पर जाने वालों की संभावित संख्या- दो से तीन लाख
इन जिलों में पलायन के ये हाल
- धार जिले की आबादी करीब 24 लाख है। आदिवासी क्षेत्रों से करीब एक लाख लोग पलायन कर चुके हैं।
- बड़वानी जिले की आबादी 16 लाख से अधिक है। हर साल अनुमानत: एक लाख से अधिक लोग रोजगार की तलाश में पड़ोसी प्रदेशों में पलायन करते हैं। कलेक्टर अमित तोमर ने बताया कि पलायन करने वालों संख्या तो तय नहीं है, लेकि न राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन के माध्यम से इसका अनुमान निकलवाया जा रहा है। प्रयास कि या जा रहा है कि जो लोग अभी जिले में हैं, उन्हें मतदान के लिए प्रेरित कि या जाए।
- खरगोन जिले की आबादी 21 लाख है। अनुमान के मुताबिक अब तक 15 हजार से अधिक मजदूरी की तलाश में महाराष्ट्र, गुजरात सहित अन्य स्थानों पर पलायन कर गए हैं।
- खंडवा जिले की हरसूद विधानसभा सीट के अंतर्गत आने वाले आदिवासी बहुल खालवा क्षेत्र से 5 से 6 हजार लोग पलायन कर रहे हैं। उज्जैन में सोयाबीन, महाराष्ट्र में गन्‍ने काटने, संतरे तोड़ने और कर्नाटक व गोवा में रेलवे के कार्यों के लिए मजदूर वहां जा रहे हैं। कलेक्टर विशेष गढ़पाले ने बताया कि खालवा क्षेत्र में मतदाता पहचान पत्र बनवा दिए गए हैं। पलायन रोकने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं।
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