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राफेल डील पर डसाल्ट ने कहा- खुद किया रिलायंस का चुनाव

पेरिस। राफेल डील पर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से खरीद प्रक्रिया की पूरी जानकारी मांगी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सीलबंद लिफाफे में उस फैसले की प्रक्रिया की डीटेल देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को होगी। इस बीच राफेल डील को लेकर डसाल्ट एविएशन ने बुधवार को खुलासा किया है कि उसने खुद ही ज्वाइंट वेंचर के पार्टनर के रूप में रिलायंस ग्रुप का चुनाव किया था।
इसके बाद ज्वाइंट वेंचर डसाल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड का गठन किया गया, जिसे रफेल एयरक्राफ्ट और फाल्कन 2000 बिजनेस जेट के पुर्जे बनाने हैं। डसाल्ट ने कहा कि उसने भारत और फ्रांस सरकार के बीच सितंबर 2016 में हुए इंटर-गवर्नमेंट एग्रीमेंट के तहत भारत को 36 रफेल विमान बेचे हैं।
फ्रांस की इन्वेस्टिगेटिव वेबसाइट मीडियापार्ट के नए खुलासे के बाद डसाल्ट की प्रतिक्रिया सामने आई है। बताते चलें कि फ्रांसीसी वेबसाइट ने दावा किया है कि डसाल्ट के पास रिलायंस डिफेंस से समझौता करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था।
बुधवार को जारी अपने स्पष्टीकरण में डसाल्ट एविएशन ने कहा कि भारतीय रक्षा खरीद प्रक्रिया नियमों के अनुपालन के लिए उसे 50 फीसद का ऑफसेट अनुबंध करना था। डसाल्ट ने इसके लिए एक ज्वाइंट वेंचर के गठन का फैसला किया।
कंपनी ने आगे कहा है कि डसाल्ट एविएशन ने स्वतंत्र रूप से इसके लिए रिलायंस ग्रुप का चुनाव किया। 10 फरवरी 2017 को ज्वाइंट वेंचर डसाल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड का गठन किया गया। बताते चलें कि राफेल विमानों का चयन यूपीए की सरकार के दौरान साल 2012 में भारतीय वायुसेना के लिए चुने गए थे।
डसाल्ट 59 हजार करोड़ रुपए की कीमत में 36 राफेल लड़ाकू विमान के सौदे में रिलायंस की मुख्य ऑफसेट पार्टनर है। फ्रांस की इन्वेस्टिगेटिव वेबसाइट मीडियापार्ट ने इस डील को लेकर जारी की एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वेबसाइट के पास मौजूद डसाल्ट के दस्तावेज पुष्टि करते हैं कि उसके पास रिलायंस को चुनने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।
इसी वेबसाइट ने पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलां के हवाले से लिखा था कि राफेल सौदे के लिए भारत सरकार ने अनिल अंबानी की रिलायंस का नाम प्रस्तावित किया था और डसाल्ट के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। राफेल डील को लेकर भारत में राजनीतिक विवाद भी चल रहा है।
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