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सियाचिन हो या जैसलमेर, सेना को नहीं होगी देर

मंडी। जिन कंधों पर देश की सुरक्षा का जिम्मा है, वे यकीनन बैटरियों का बोझ ढोने के लिए नहीं बने हैं। राजस्थान के तपते रेगिस्तान हों या फिर खून जमा देने वाले सियाचिन के ग्लेशियर, हर जगह अब स्वदेशी सुपर कैपिस्टर दुश्मन पर भारी पड़ेंगे। निकट भविष्य में देश को सुपर कैपिस्टर के लिए स्विटजरलैंड की ओर नहीं ताकना पड़ेगा।
हिमाचल प्रदेश के मंडी स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में उच्च क्षमता के सुपर कैपिस्टर बनेंगे। आम बैटरी के मुकाबले इनमें कई हजार गुणा अधिक एनर्जी होगी। चार्जिंग के लिए घंटों इंतजार नहीं करना होगा और जवानों के कंधे से बोझ भी कम होगा। मेक इन इंडिया के तहत देश में सुपर कैपिस्टर बनाने का जिम्मा रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने आईआईटी को सौंपा है।
स्कूल ऑफ कंप्यूटिंग एंड इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सतींद्र कुमार शर्मा की अगुआई में विशेषज्ञों ने सुपर कैपिस्टर पर काम शुरू कर दिया है।
तोप और राइफल को चाहिए बैटरी
बैटरी की जरूरत राइफल से लेकर तोप तक, हर हथियार में पड़ती है। खासकर रात के समय सबसे अधिक उपयोग होता है। नाइट विजन डिवाइस व हथियार में लक्ष्य तय करने के लिए लगे उपकरण बैटरी से ही संचालित होते हैं। रेडियो व वायरलैस नेटवर्क स्थापित करने में बैटरी की जरूरत पड़ती है।
ऑपरेशन, युद्ध या फिर गश्त के दौरान जवानों को बैटरियों का बोझ लगातार उठाए रहना पड़ता है। सियाचिन को छोड़ अन्य क्षेत्रों में सेना को अब भी ड्राई और लीथियम ऑयन बैटरी से काम चलाना पड़ता है। अधिक तापमान, मानसून या फिर बर्फीले क्षेत्रों में ड्राई व लीथियम बैटरी डिस्जार्च होने से ऐन मौके पर गच्चा देती आई हैं। इससे जवानों के हाथ बंध जाते हैं। सुपर कैपिस्टर से सेना को बैटरी की समस्या से नहीं जूझना पड़ेगा।

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