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गहरा सकता है NPA संकट, RBI के नए नियमों की मियाद आज हो रही खत्‍म

नई दिल्ली। रिजर्व बैंक के नए नियमों के अंतर्गत एनपीए पर मिली छह महीने की मोहलत सोमवार (27 अगस्त, 2018) को खत्म हो रही है।
इसकी वजह से फंसे कर्जे (एनपीए) के दलदल में धंस रहे देश के सरकारी बैंकों की स्थिति और खराब हो सकती है। एक अनुमान के मुताबिक, इस तिथि के बाद तकरीबन तीन लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि एनपीए में जुड़ सकती है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मार्च, 2018 में सरकारी क्षेत्र के बैंकों का एनपीए 10.41 लाख करोड़ रुपये था, जो इस नियम की वजह से 13-13.50 लाख करोड़ रुपये की सीमा लांघ सकता है। इस हालात से न सिर्फ बैंकों में घबराहट है, बल्कि वित्त मंत्रालय और आरबीआइ भी आगे की स्थिति से निपटने के रास्ते को लेकर सजग हैं
सोमवार को कई बैंकों की बोर्ड बैठक में इस बारे में अहम फैसला होने की उम्मीद है। 12 फरवरी, 2018 को आरबीआइ की तरफ से जारी अधिसूचना में कर्ज नहीं चुकाने वाले ग्र्राहकों के खातों को पुनर्निधारित करने के तत्कालीन सभी विकल्पों को समाप्त कर दिया गया था।
इसमें यह भी कहा गया था कि अगर कर्ज चुकाने में निर्धारित अवधि से एक दिन की भी चूक होती है तो उसे एनपीए माना जाना चाहिए और उन खातों के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
इसके तहत, पुराने सभी कॉरपोरेट खातों का निपटारा करने के लिए 180 दिनों का समय बैंकों को दिया गया था। यह अवधि 27 अगस्त, 2018 को समाप्त हो रही है।
वित्त मंत्रालय, कॉरपोरेट सेक्टर और बैंकों को भी आरबीआइ का यह नियम पसंद नहीं आया लेकिन अभी तक केंद्रीय बैंक इस पर अडिग है। आरबीआइ का कहना है कि यह बैंकिंग सिस्टम में जितने संभावित एनपीए हैं उनको बाहर लाने के लिए जरूरी है।
हाल ही में रेटिंग एजेंसी इकरा की तरफ से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 70 ऐसे बड़े कॉरपोरेट खाते हैं जिन्हें आरबीआइ के नियम के मुताबिक एनपीए खाता घोषित किया जा सकता है। इससे एनपीए की राशि में 3.8 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हो सकती है।
बैंकिंग क्षेत्र के सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ हफ्तों के दौरान लगातार समीक्षा के बाद यह बात सामने आ रही है कि तकरीबन 60 कंपनियों के खातों को नए नियम के मुताबिक एनपीए में तब्दील करने की सिफारिश हो सकती है। इनमें 3.4 लाख करोड़ रुपये का कर्ज फंसा हुआ है।
अगर यह राशि एनपीए के तौर पर चिन्हित हो जाती है तो इन सभी कंपनियों के दिवालिया होने की प्रक्रिया बैंकों को शुरू करनी होगी। इस बारे में सोमवार को एसबीआइ, पीएनबी, बीओबी, केनरा बैंक समेत कई बैंकों की आतंरिक बैठक होने वाली है, जिसमें आगे के कदमों पर अंतिम फैसला होगा।
जिन खातों पर अंतिम तौर पर गाज गिरने के आसार हैं उनमें बिजली, संचार, रियल एस्टेट जैसे क्षेत्र की कंपनियां हैं। इसलिए इनके बारे में किए जाने वाले किसी भी फैसले का पूरी अर्थव्यवस्था पर असर होगा। ऐसे में वित्त मंत्रालय भी सतर्क है।
एक संभावना यह जताई जा रही है कि पिछले छह महीने की रिपोर्ट के आधार पर आरबीआइ कहीं मौजूदा नियमों की मियाद आगे बढ़ाने को तैयार हो जाए। क्योंकि बैंक कुछ कंपनियों के बकाए कर्जे के भुगतान को लेकर थोड़ी नरमी बरतने को तैयार हैं। मसलन, बिजली क्षेत्र की कुछ कंपनियों की स्थिति सुधरने के संकेत हैं।
अगर उन्हें अभी एनपीए घोषित किया जाएगा तो उन्हें पटरी पर लाने की कोशिशें धाराशाई हो सकती हैं। दरअसल, बैंक भी चाहते हैं कि इन कंपनियों का मामला दिवालिया कानून के तहत राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में नहीं जाए क्योंकि वहां वक्त काफी लगता है।
इस बात की भी गारंटी नहीं है कि कर्ज वसूली की राशि पर्याप्त होगी। पिछले वर्ष आरबीआइ ने देश के 12 सबसे बड़े एनपीए खाताधारक कंपनियों में नए दिवालिया कानून के तहत कर्ज वसूली प्रक्रिया शुरू करवाई थी।
इनमें सिर्फ भूषण स्टील, इलेक्ट्रोस्टील लिमिटेड, मोनेट इस्पात व इनर्जी की प्रक्रिया संपन्न होने के कगार पर है। जबकि अन्य सभी मामले कानूनी पचड़े में फंसे हुए हैं।
इसमें आलोक इंडस्ट्रीज जैसी कंपनी भी शामिल है जिस पर बैंकों का 29,614 करोड़ रुपये बकाया है, जबकि दिवालिया प्रक्रिया के तहत इसकी सबसे ज्यादा बोली 5,050 करोड़ रुपये की लगी है। यह काफी कम है। यही वजह है कि बैंक हर एनपीए खाता को दिवालिया कानून के तहत नहीं ले जाना चाहते।
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