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बीहड़ों से निकलकर बॉर्डर तक पहुंचे चंबल के हजारों लड़ाके

मुरैना। सेना में रहकर वीरगति पाने वाले मध्यप्रदेश के कुल शहीद सैनिकों में से 45.1 फीसद चंबल के भिंड और मुरैना से हैं। बंजर बीहड़ के बीच से गुजरी चंबल नदी ने इस इलाके के नौजवानों को एक अनोखे फाइटिंग जीन (आनुवांशिक कारक) से नवाजा है। अपने स्वाभिमान के लिए अत्याचार और अन्याय के खिलाफ बंदूक उठा बीहड़ में कूद जाने वाले यहां के युवा बागी हो जाया करते थे। इन युवाओं के हाथों में बंदूक तो अब भी है, लेकिन उनके पांव बीहड़ की बजाय बॉर्डर की ओर बढ़ गए हैं।
यहां के 40 हजार युवा सेना में हैं। इंदौर के जानापांव पहाड़ी से निकलकर मध्यप्रदेश के मुरैना और भिंड जिले तक आने वाली चंबल नदी जब बीहड़ों से गुजरती है तो यहां की मिट्टी के कुछ खास तत्व इस पानी में मिल जाते हैं। बहरहाल, यहां के अधिकांश युवा 12वीं पास करते ही सेना में जाने के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं। सेना के ग्वालियर रिक्रूटमेंट सेंटर से हर साल मध्यप्रदेश के जिन 13 जिलों के युवाओं की भर्ती की जाती है, उनमें आधे से ज्यादा सिर्फ भिंड और मुरैना से चयनित होते हैं। वर्तमान में भिंड जिले के करीब 25 हजार और मुरैना जिले के 14 हजार युवा सेना में रहकर सेवा दे रहे हैं।
भिंड में वीरांगनाओं की अलग कॉलोनी -
चंबल के शहीदों की संख्या इतनी अधिक है कि उनके परिवारोंके लिए सरकार को अलग से कॉलोनियां बसानी पड़ी हैं। भिंड जिले में तीन सैनिक कॉलोनियां हैं। शहादत का गौरवमय इतिहास मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने 14 अगस्त से शहीद सम्मान अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इसके लिए शहीदों के बारे में जानकारी एकत्रित की गई। जानकारी के अनुसार अब तक प्रदेश के 312 जवान सेना में रहते हुए शहीद हुए। खास बात यह है कि इनमें से 137 शहीद चंबल के रहने वाले थे। इनमें से सर्वाधिक 81 शहीद सैनिक चंबल के भिंड जिले से हैं और दूसरी बड़ी संख्या मुरैना से 56 शहीदों की है। दोनों ही जिलों में 16-16 गेलेंट्री अवार्डी भी हैं। जिनमें सर्वोच्च वीरता पदक विजेता भी हैं।
गांव जहां हर परिवार में फौजी -
चंबल के मुरैना जिले के तरसमा गांव में वर्तमान में 400 घर हैं। यहां हर घर से कम से कम दो युवा सेना और अर्धसैनिक बलों में हैं। यहां सवा आठ सौ से ज्यादा रिकॉर्ड युवा सेना में हैं। मुरैना का ही काजी बसई गांव भी 
करीब 380 घरों की बस्ती है। यहां 458 युवा सेना में सेवा दे रहे हैं।

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