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पढ़िए असम की पूरी कहानी, अवैध बांग्लादेशियो की समस्या ऐसे हो गई विस्फोटक

 असम में इन दिनों उहा-पोह की स्थिति बनी हुई है। करीब 40 लाख लोगों की नागरिकता सवालों के घेरे में आ गई है। इन लोगों का भविष्य क्या होगा? क्या उन्हें कभी भारत से निकाला जा सकेगा? ये सवाल उठ रहे हैं। दरअसल, बांग्लादेश से अवैध रूप से घुसे लोगों ने असम का ताना-बाना बिगाड़ दिया है।
घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए यह अभियान करीब चार दशकों से चल रहा है। साल 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वहां से पलायन कर लोग भारत में भाग आए और यहीं बस गए। इस कारण स्थानीय लोगों और घुसपैठियों में कई बार हिंसक वारदातें हुईं।
दरअसल, बांग्लादेश से अवैध रूप से आने वाले लोगों की वजह से स्थानीय लोगों को लगने लगा था कि वे लोग स्थानीय लोगों के संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं। इस तरह जनसंख्या में हो रहे बदलावों से भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा की भावना पैदा हो गई।
1980 के दशक से ही यहां घुसपैठियों को वापस भेजने के आंदोलन शुरू हो गए। घुसपैठियों को बाहर निकालने का आंदोलन सबसे पहले 1979 में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और असम गण परिषद ने शुरू किया। यह हिंसक आंदोलन करीब 6 साल तक चला।
इस बीच 1983 में होने वाले चुनावों का बड़ी संख्या में लोगों ने बहिष्कार कर दिया। साथ ही बड़े पैमाने पर आदिवासी, भाषाई और सांप्रदायिक पहचान के नाम पर हिंसा होने लगी। आखिरकर हिंसा को रोकने 1985 में केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हुआ, जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है।
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