Home » » गौरतलब है कि करुणानिधि का 7 अगस्त को निधन हो गया था। तमिलनाडु की राजनीति के सबसे करिश्माई नेताओं में गिने जाने वाले करुणानिधि पांच बार मुख्यमंत्री रहे। उनके परिवार में उनकी दो पत्नियां और छह बच्चे हैं। द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन उनके छोटे बेटे हैं। उनकी बेटी कनीमोरी राज्यसभा की सदस्य हैं। बता दें करुणानिधि ने काफी पहले ही स्टालिन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर उन्हें डीएमके का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था। वहीं संप्रग सरकार में केंद्रीय मंत्री बने रहने के बाद 2014 में अलागिरी को पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया था। लेकिन, अब अलागिरी के बगावती तेवर के बाद स्टालिन के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। बर्खास्त होने से पहले दोनों भाइयों के बीच उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष चरम पर रहा।

गौरतलब है कि करुणानिधि का 7 अगस्त को निधन हो गया था। तमिलनाडु की राजनीति के सबसे करिश्माई नेताओं में गिने जाने वाले करुणानिधि पांच बार मुख्यमंत्री रहे। उनके परिवार में उनकी दो पत्नियां और छह बच्चे हैं। द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन उनके छोटे बेटे हैं। उनकी बेटी कनीमोरी राज्यसभा की सदस्य हैं। बता दें करुणानिधि ने काफी पहले ही स्टालिन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर उन्हें डीएमके का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था। वहीं संप्रग सरकार में केंद्रीय मंत्री बने रहने के बाद 2014 में अलागिरी को पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया था। लेकिन, अब अलागिरी के बगावती तेवर के बाद स्टालिन के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। बर्खास्त होने से पहले दोनों भाइयों के बीच उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष चरम पर रहा।

रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार ने कवर्धा के इंस्पेक्टर अजीत ओगरे को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देकर उनकी बहादुरी का सम्मान किया है। अजीत ओगरे 14 साल की नौकरी में 53 बार नक्सलियों से मुठभेड़ कर चुके हैं। उन्हें तीन बार गोलियां भी लगीं। एक तरफ जहां दूसरे पुलिस वाले नक्सल इलाके में पोस्टिंग से घबराते हैं और ट्रांसफर के लिए तमाम तरह की जुगत लगाते हैं वहीं ओगरे ऐसे शख्स हैं जो खुद नक्सल इलाकों में अपनी पोस्टिंग करवाते रहे हैं।
उन्हें कई बार मैदानी इलाकों में पोस्टिंग का ऑफर मिला लेकिन नक्सलवाद खत्म करने का उनका जुनून ऐसा है कि वे इसी मोर्चे पर डटे रहना चाहते हैं। अपनी पूरी सर्विस में अब तक उन्होंने जंगल के थानों को ही चुना है। राजनांदगांव में पदस्थापना के दौरान उन्होंने कई बार सफल मुठभेड़ों का नेतृत्व किया और कई हार्डकोर नक्सलियों को मार गिराया।
इसी साल कवर्धा को नक्सल प्रभावित जिला घोषित किया गया तो वे कवर्धा में नक्सल ऑपरेशन की कमान संभालने चले गए। उनके बेहतरीन सर्विस रिकार्ड को देखते हुए उच्चाधिकारियों ने उन्हें कई बार मनचाही पोस्टिंग लेने का ऑफर दिया लेकिन उनकी मनचाही पोस्टिंग जंगल ही रही।
अजीत ओगरे पहले रायपुर में रहते थे और हिंदुस्तान लीवर कंपनी की ट्रक चलाया करते थे। बाद में टैक्सी भी चलाई। 2004 में उनका चयन पुलिस सब इंस्पेक्टर के तौर पर हुआ और पोस्टिंग मिली बस्तर के जंगलों में। इसके बाद नक्सलवाद का सफाया उनका लक्ष्य बन गया। वे लगातार जंगलों में रहे।
कई-कई दिनों तक जंगल में कैंप लगाकर नक्सलियों का पीछा किया। उनके कारनामों को देखते हुए सरकार ने तीन साल पहले उनका प्रमोशन सब इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर के पद पर कर दिया था। तीन साल के बाद राज्य सरकार ने फिर उन्हें आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देकर डीएसपी बना दिया है।
नक्सलियों ने अजीत डोगरे को खत्म करने के लिए विशेष टीम बनाई है। अजीत अपनी एके 47 रायफल सदा साथ रखते हैं। सोते वक्त भी रायफल उनकी बगल में ही रहती है। सरकार ने उन्हें पिस्टल भी दी है। अजीत ओगरे को तीन बार राष्ट्रपति पदक मिल चुका है। उनका नाम कीर्ति चक्र के लिए भी प्रस्तावित किया गया है।
13 दिन तक करते रहे पीछा-
2011 में ओगरे की नियुक्ति धमतरी जिले के सिहावा थाने में थी तो वहां नक्सली दंपती सोनू और कमला सरेंडर करने आए। बाद में दोनों थाने के हथियार लेकर फरार हो गए। इसकी जानकारी जब ओगरे को मिली तो वे जंगल में थे। वहीं से उन्होंने फरार नक्सलियों का पीछा करना शुरू कर दिया। वे अपनी टीम के साथ 13 दिन तक बिना नहाए जंगल की खाक छानते रहे। आखिरकार उन्होंने नक्सली दंपती को तलाश लिया और मार गिराया।
परिवार हमेशा साथ रखते हैं-
ओगरे नक्सल इलाकों में पदस्थापना के दौरान अपने परिवार को अपने साथ ही रखते हैं। कई बार वे लगातार जंगल में रहते हैं तो उनकी पत्नी को पता भी नहीं होता कि वे कहां हैं और कब आएंगे। ओगरे परिवार के साथ को अपनी ताकत मानते हैं। 39 साल के अजीत युवा पुलिस वालों के लिए प्रेरणा हैं।
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