Home » » 100 में से 43 आदिवासी बच्चों का घर पर होता है जन्म, नहीं मिल पाते सुरक्षित हाथ

100 में से 43 आदिवासी बच्चों का घर पर होता है जन्म, नहीं मिल पाते सुरक्षित हाथ

श्योपुर। प्रसव के दौरान गर्भवती महिला व उसके नवजात की मौत को रोकने के लिए सरकार ने संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के कई योजनाएं चलाईं, अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ाईं। योजना और सुविधाओ की दम पर सरकार दावा करती है कि, अब बच्चों का जन्म अस्पतालों में सुरक्षित हाथों में हो रहा है, लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि, जिस खास वर्ग के लिए यह योजना लागू की गई थी। उस आदिवासी वर्ग को इनका लाभ ही नहीं लिया। आज भी आदिवासी समाज की आधी गर्भवती महिलाओं का प्रसव अस्पताल के बजाए घर में हो रहा है। चौकाने वाला यह सच किसी और नहीं बल्कि, सरकार के आंकड़ों ने बताया है।
दरअसल, 05 अगस्त को स्वास्थ्य एवं महिला बाल विकास विभाग के संकेतकों की सहायता से जो आंकड़े निकलकर सामने आए हैं। वह बेहद चौकाने वाले हैं। आदिवासी विकासखंड कराहल में घर में होने वाले प्रसव का आंकड़ा 43.3 प्रतिशत है। इसम कराहल के अन्य वर्ग भी शामिल हैं, यदि सिर्फ आदिवासियों के प्रतिशत का आंकलन किया जाए, तो यह आधे से भी अधिक होगा। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात तो यह है कि, श्योपुर विकासखंड में 69.6 प्रतिशत महिलाओं का पंजीयन गर्भ के 3 माह बाद तक नहीं हो पाता है, जिससे उनका टीकाकरण प्रभावित हो रहा है।
पंजीयन का यह आंकड़ा विजयपुर में 67 प्रतिशत और कराहल में 46.7 प्रतिशत है। विचारणीय प्रश्न यह है कि, टीकाकरण के लिए पंजीयन का काम आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और आशा कार्यकर्ताओं तथा एनएएम के जिम्मे है, जब यह गर्भवतियों का पंजीयन ही नहीं कर रही हैं, तो फिर टीकाकरण कैसे हो रहा है। बता दंे कि, सरकार ने प्रसव के दौरान होने वाली जच्चा-बच्चा की मौत को रोकने के लिए प्रदेश के 85 विकासखंडों को हाई बर्डन क्षेत्र घोषित किया है। इसमें श्योपुर जिले के तीनों विकासखंड शामिल किए गए है। इसके बाद भी सुधार होने के बजाय हालात बिगड़ते जा रहे हैं।
स्थागत प्रसव के लिए इतने प्रयास -
प्रसूता महिला को घर जाने और प्रसव के बाद वापस घर छोड़ने के लिए जननी सेवा है।
अस्पताल में प्रसव होने पर महिला को 06 हजार रुपए दिए जाते हैं।
प्रसूता अगर गरीब, आदिवासी है, तो संबल योजना की हितग्राही है तो 16 हजार रुपए दिए जाते हैं।
आदिवासी महिलाओं के लिए बरगवां व गोरस जैसे उप स्वास्थ्य केंद्रों में डिलीवरी पॉइंट बनाए गए हैं।
इसी महीने से श्योपुर जिले में विशेष तौर से हिरण्य गर्भ मातृ मुस्कान योजना शुरू की गई है, जिसके तहत गर्भवती महिलाओं का संपूर्ण टीकाकरण, उसका उपचार एवं परीक्षण आसान करने के लिए अच्छे डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई है।
इसलिए अस्पताल तक नहीं पहुंच पा रहीं गर्भवती -
अधिकतर गर्भवतियों के प्रसव के लिए अस्पताल नहीं पहुंचने का जो कारण सामने आया है। वह चौकाने वाला है। जिन महिलाओं का घर पर प्रसव हुआ है, उन्होंने बताया कि, वह इसलिए प्रसव कराने अस्पताल नहीं पहुंची, क्योंकि अस्पताल में बिना पूछे कॉपर-टी लगाई जा रही है, बाद में कॉपर-टी निकालने के लिए रुपए मांगे जाते हैं। वंशवृद्धि रुकने के डर से परिजन गर्भवतियों का प्रसव अस्पताल के बजाए घर पर अधिक करा रहे हैं।
गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान बिना पूछे कॉपर-टी लगाने की सूचना मिली है। मानवाधिकार एवं महिला की स्वंत्रता हनन की श्रेणी में आता है। इस संबंध में सोमवार को कलेक्टर को ज्ञापन दिया जाएगा। -सरोज तोमर महिला आयोग सखी
आदिवासियों में घरेलू प्रसव अधिक हो रहे हैं, जो आंकड़े जारी किए गए है। वह एक साल पुराने सर्वे के आधार पर है। अब इसमें सुधार हुआ है। मातृ प्रणाम योजना संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित होगी। -रतनसिंह गुंड्या डीपीओ, श्योपुर
Share This News :
 
Site Link : Contact Us | sitemap
Copyright © 2013. khabrokakhulasa.com | Latest News in Hindi,Hindi News,News in Hindi - All Rights Reserved
Template Modify by Unreachable
Proudly powered by Blogger