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व्यापमं की तरह NLIU में एनआरआई सीटों की हेराफेरी

भोपाल।व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) की तर्ज पर नेशनल लॉ इंस्टिट्यूट यूनिवर्सिटी (एनएलआईयू) में 2016-17 तक एनआरआई कोटे के दाखिलों में गड़बड़ियां की गई हैं। हालांकि यह गड़बड़ी 2014 से जारी थी, लेकिन 2016-17 में करीब 8 छात्रों को नियमों के विरुद्ध जाकर प्रवेश दिया गया।
इस बात की पुष्टि गोपनीय जांच रिपोर्ट में भी हो चुकी है। इसके लिए सुनियोजित तरीके से पहले यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर द्वारा अपने खास लोगों को पात्र नहीं होने के बाद भी नियुक्त किया गया और बाद में उन्हें ही प्रवेश समिति का सदस्य भी बनाया।
छात्रों के प्रदर्शन के बाद पूर्व डायरेक्टर प्रो.एसएस सिंह के खिलाफ हुए प्रदर्शन और उन पर लगे आरोपों की जांच के लिए समिति बनाई गई थी। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपर मुख्य सचिव बीआर नायडू और प्रमुख सचिव एएम सक्सेना को यह जांच सौंपी थी। समिति ने सभी बिंदुओं पर जांच कर रिपोर्ट चीफ जस्टिस को करीब दो माह पूर्व भेज दी है, लेकिन यूनिवर्सिटी द्वारा अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
समिति ने जांच रिपोर्ट में अनुशंसा भी की थी कि प्रो. सिंह के डायरेक्टर रहते हुए जितनी भी नियुक्तियां हुई हैं, वे पद का दुरुपयोग करते हुए की गई हैं। वहीं परीक्षा में फेल विद्याथियों को पास करने के मामले की जांच रिपोर्ट पर भी कोई निर्णय नहीं लिया गया है। हालांकि जांच रिपोर्ट सौंपने के बाद और कार्यपरिषद की बैठक में इसे रखा भी गया, लेकिन परिषद किसी निर्णय पर नहीं पहुंची। इधर प्रो. सिंह ने बैठक से पहले ही पद से अपना इस्तीफा दे दिया था।
पिछले दरवाजे से दी नियुक्ति
जांच रिपोर्ट के अनुसार प्रो. सिंह ने पद का दुरुपयोग करते हुए रोहित शर्मा और नरेश कुमार को पिछले दरवाजे से नियुक्ति दे दी । रोहित शर्मा पद के लिए पात्र नहीं थे, जबकि नरेश कुमार को पद नहीं होने के बाद भी कंसलटेंट के पद पर नियुक्त किया गया। रोहित शर्मा को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि एक प्राइवेट कंपनी में 5000 रुपए प्रतिमाह के वेतन पर काम करने वाले को प्रो. सिंह ने यहां 2009 में 8000 रुपए प्रतिमाह के वेतन पर रखा। उन्हें कंज्यूमर प्रोटेक्शन एंड कंज्यूमर वेलफेयर प्रोजेक्ट में बिना किसी साक्षात्कार, विधि की डिग्री और रिसर्च योग्यता के रखा गया।
नियुक्ति के दो साल बाद ही अचानक इनका वेतन भी 2010-11 में 10 से 12 हजार रुपए कर दिया। इस दौरान रोहित एनएलआईयू में स्थाई कर्मचारी हो गए थे। 2013 में प्रो. सिंह के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (आईआईपीए) में जाने के साथ ही वे रोहित शर्मा को अपने साथ ले गए। यहां से 31 अक्टूबर 2013 प्रो. सिंह दोबारा डायरेक्टर बनाए गए। इस बार आईआईपीए के अनुभव के आधार पर रोहित शर्मा को 25 हजार रुपए प्रति माह पर नियुक्त कर दिया गया।
उन्हें बीसीए की डिग्री होने के बावजूद उच्च वेतन पर बतौर प्रोग्रामर नियुक्त किया गया, जबकि इस पद के लिए बीई की डिग्री होना जरूरी है। इस नियुक्ति के साथ प्रो. सिंह ने रोहित को आवास, हवाई यात्राओं भत्ता समेत अन्य सुविधाएं भी मुहैया करवाईं, इन सुविधाओं के लिए भी रोहित पात्र नहीं थे। इसी तरह नरेश कुमार के असिस्टेंट रजिस्ट्रार बनाए जाने पर भी आपत्तियां जताई हैं।
प्रवेश समिति में भी घालमेल
जांच रिपोर्ट के अनुसार 2016-17 में एडमीशन के लिए बनाई गई समिति में प्रो. सिंह ने प्रो. एसपी सिंह, रजिस्ट्रार सीएनएलयू पटना, डॉ. आनंद पवार आरजेएनएलयू पटियाला के अलावा पात्रता नहीं होने बाद भी रोहित शर्मा को सदस्य बनाया। ताकि वे एनआरआई कोटे की सीटें मैनेज कर सकें। इन सीटों पर प्रवेश के दौरान समिति के अन्य सदस्य कई बार भोपाल भी आए।
इस्तीफा दे दिया इसलिए नहीं की कार्रवाई
जांच रिपोर्ट पेश होने के बाद प्रो. एसएस सिंह ने अपने पद से स्वयं ही इस्तीफा दे दिया था, इसलिए आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई। हालांकि हमने यह रिपोर्ट कार्यपरिषद की बैठक में रखी थी। 
गिरीबाला सिंह, रजिस्ट्रार, एनएलआईयू
राष्ट्रपति को हुई है शिकायत
आरटीआई एक्टिविस्ट अजय दुबे ने इस मामले की शिकायत राष्ट्रपति के अलावा राज्यपाल, बार काउंसिल ऑफ इंडिया से भी की है। उन्होंने शिकायत में पूरे मामले की विस्तृत जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
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