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दंतेवाड़ा को जावंगा एजुकेशन सिटी से दुनियाभर में मिल रही नई पहचान

छत्तीसगढ़ के धुर नक्सल प्रभावित जिलों में शामिल रहे दंतेवाड़ा की अब पहचान बदल रही है। सड़क और लाल पानी से लेकर क्षेत्र में समस्याएं तो ढेरों हैं, लेकिन शिक्षा ने इसे नई पहचान दी है। यहां की जावंगा एजुकेशन सिटी चर्चा का विषय बनी हुई है। देश ही नहीं, विदेशों से भी लोग इसे देखने आते हैं। इस विधानसभा क्षेत्र में नक्सलवाद सिमटा तो है, लेकिन अभी खत्म नहीं हुआ है।
भूगोल : दंतेवाड़ा जिले के तहत आने वाली इस विधानसभा के पूर्व में जगदलपुर व चित्रकोट, पश्चिम में बीजापुर, उत्तर में चित्रकोट व नारायणपुर तथा दक्षिण में कोंटा विधानसभा की सीमा है। लौह अयस्क के भंडार बैलाडीला की पहाड़ी और जंगलों से आच्छादित यह विषम भौगोलिक क्षेत्र है।
प्रशासन : चार ब्लाक दंतेवाड़ा, गीदम, कुआकोंडा और कटेकल्याण हैं। चारों तहसील भी हैं। चार जनपद पंचायत वाली इस विधानसभा में पांच नगरीय निकाय हैं। दंतेवाड़ा, बचेली और किरंदुल नगरपालिका परिषद तथा बारसूर व गीदम नगर पंचायतें हैं। 124 ग्राम पंचायतें हैं।
आर्थिक: मुख्य आजीविका कृषि व वनोपज है। किरंदुल-बचेली एरिया में लौह अयस्क का उत्खनन एनएमडीसी करता है। एस्सार का भी उपक्रम हैं। दोनों संस्थानों में श्रमिक और लघु वर्ग कर्मचारियों के पद पर स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है। अन्य उद्योग नहीं हैं। इससे लोग मानसून के बाद रोजगार के लिए तेलंगाना, तमिलनाडु और अन्य प्रदेशों में पलायन करते हैं।
शिक्षा : जिले में छह कॉलेज, एक लाइवलीहुड कॉलेज और दो आइटीआइ व एक प्राइवेट नर्सिंग इंस्टीट्यूट हैं। 18 पोटाकेबिन और करीब 125 आश्रम शालाओं से शिक्षा के प्रति रुचि बढ़ने लगी है। जावंगा में एजुकेशन हब है, जो देश-दुनिया में पहचान बना चुका है। दिव्यांग बच्चों के लिए सक्षम, नक्सल पीड़ित परिवारों के बच्चों के लिए आस्था गुरुकुल जैसे शैक्षणिक संस्थान जावंगा में हैं।
सड़क : विधानसभा क्षेत्र की मुख्य सड़क किरंदुल से जगदलपुर और जिला मुख्यालय से ब्लाक मुख्यालयों को जोड़ने वाली सड़कों को छोड़ दें तो अंदरूनी इलाकों की सड़कों की हालत जर्जर है। नक्सलियों ने सड़कों को कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त कर दिया है। ब्लॉक मुख्यालयों से अंदरूनी इलाकों में सड़क निर्माण फोर्स के साये मेंं चल रहा है। सुकमा को जोड़ने वाली अरनपुर- जगरगुंडा स्टेट हाइवे मार्ग दशकों से नक्सलियों के कब्जे में रहा।
अब इसका निर्माण सीआरपीएफ जवानों की तैनाती में हो रहा है। इसी तरह बारसूर से पल्ली सड़क का निर्माण जारी है। दोनों ही सड़क निर्माण के दौरान फोर्स ने सैकड़ों बम बरामद किए हैं। एक दर्जन से अधिक विस्फोट हो चुके हैं।
घोषणाओं और वादों का हाल
- दस साल पहले भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में जिले से हेलीपैड की घोषणा हुई थी, जो आज तक मूर्त रूप नहीं ले पाया है।
इस वजह से देरी : जिला मुख्यालय के पास जमीन नहीं मिलने से हवाईपट्टी निर्माण मंे देरी होती रही है। प्रशासन की पहल पर बालूद गांव में छोटे-बड़े झाड़ वाली जमीन मिली, लेकिन यहां भी कुछ हिस्सा निजी स्वामित्व का था। इसके निपटारे में सात साल से अधिक समय लग गया। अब केंद्र सरकार और विमानन विभाग से स्वीकृति मिल चुकी है। पहले चरण की राशि प्राप्त होने के बाद वन विभाग को चेक सौंप दिया गया। कार्य की प्रगति बेहद धीमी है।
- डियर पार्क नहीं हुआ तैयार : जिला मुख्यालय के करीबी जंगल में बहुतायत में चीतल रहते है। गर्मी में ये पानी की तलाश में नगरीय इलाके तक पहुंच जाते हैं। 2015 में पुल से गिरकर एक चीतल की मौत भी हो चुकी है। चीतलों के संरक्षण- संवर्धन और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दंतेवाड़ा से लगे ग्रामीण इलाके को डियर पार्क बनाने की घोषणा भी हुई थी, जो अब तक पूरी नहीं हो पाई है।
इस वजह से देरी : योजना को मूर्त रूप देने में वन विभाग ने कभी दिलचस्पी नहीं ली। जनप्रतिनिधियों ने ही इसकी घोषणा की है। विभाग की सुस्ती की वजह से अब तक जमीन फाइनल करने का काम भी नहीं हुआ है।
- किरंदुल- बचेली सहित पूरे जिले में आयरनयुक्त और लाल पानी से मुक्ति दिलाने की घोषणा हर चुनाव में होती है, लेकिन अब तक समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। बस्तर विकास प्राधिकरण की बैठक में भी लाल पानी प्रभावित गांवों से इस समस्या को दूर करने की घोषणा पांच साल पहले की गई थी।
इसलिए हुई देरी : जिला प्रशासन ने डीएमएफ और सीएसआर मद से नेरली- धुरली में करोड़ों की लागत से जल शोधन संयंत्र की स्थापना और पाइप लाइन बिछाने का कार्य स्वीकृत हुआ। पीएचई के अधिकारियों की रुचि नहीं लेने की वजह से दो साल तक प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हो पाया। जिला प्रशासन ने निर्माण एजेंसी और अधिकारियों को बदलकर सालभर पहले प्रोजेक्ट को शुरू किया है। इससे इलाके के 32 गांवों को शुद्ध पेयजल प्राप्त होगा।
2018 के चुनाव में ये बन सकते हैं मुद्दे 
- नक्सलवाद और लाल पानी की समस्या।
- सड़क, पानी व बिजली की समस्या।
- धान और तेंदूपत्ता दर व बोनस का मामला।
- एनएमडीसी में स्थानीय भर्ती और रोजगार की समस्या।
यहां की बदली तस्वीर
- लाइवलीहुड कॉलेज और जावंगा एजुकेशन सिटी : जिला मुख्यालय में लाइवलीहुड कॉलेज में कारपेंटर, इलेक्ट्रीशियन, ब्यूटी पार्लर, सिलाई- कढाई का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां प्रशिक्षण पाकर निरक्षर और अल्प शिक्षित युवक- युवतियां स्वरोजगार से आय अर्जित कर रहे हैं। जावंगा में नक्सल पीड़ित और अन्य बच्चों के लिए एक ही परिसर में नर्सरी से लेकर हाईस्कूल तक आवासीय विद्यालय खोला गया। यहां महानगरीय सुविधाओं के साथ बच्चों हिंदी- अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जा रही है। इसके साथ ही तकनीकी ज्ञान के लिए पॉलीटेक्निक और आइटीआइ खोला गया। इतना ही नहीं, परिसर में हॉकी, कबड्डी, तीरंदाजी और अन्य खेल विधा में बच्चें पारंगत हो रहे हैं।
कड़कनाथ पोल्ट्री फार्म और ई- रिक्शा
जिला प्रशासन की मदद से जिले में 100 से अधिक महिला समूह ई-रिक्शा चला रहे हैं। वहीं ककड़नाथ कुक्कुट पालन का स्वरोजगार अपना लिया है। इससे महिलाओं के साथ उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आई है।
कोचिंग सेंटर : हाईस्कूल के बच्चों को पीईटी- पीएमटी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के पूर्व प्रशिक्षण के लिए छू लो आसमां कोचिंग सेंटर, स्कूलों में विशेषज्ञ शिक्षषकों की नियुक्ति, जिला हॉस्पिटल में डायलिसिस मशीन की स्थापना, सर्जनों की नियुक्ति, स्वास्थ्य केंद्रों में एमबीबीएस डॉक्टरों के साथ अतिरिक्त स्टाफ भर्ती होने से कुपोषण, महामारी, मलेरिया आदि बीमारियां नियंत्रण पर हैं। संस्थागत प्रसव में बढ़ोतरी, शिशु-मातृ मृत्यु दर में गिरावट आई है।
देश का पहला डिजिटल विलेज
नोटबंदी के बाद कैशलेस गांव के रूप में नक्सल प्रभावित पालनार को विकसित किया गया। प्रशासन की पहल से यहां स्थित कॉम्प्लेक्स में कैशलेस ट्रांजेक्शन की व्यवस्था की गई। इंटरनेट सुविधा नहीं होने के चलते वाई-फाई से कॉम्प्लेक्स की दुकानों को जोड़ा गया।
मेरे बोल
प्रदेश में भाजपा की सरकार है। विपक्ष में रहने से हमारी सुनवाई नहीं होती। विकास कार्यों पर भी सरकार और प्रशासन का ध्यान ज्यादा नहीं रहता। गुणवत्ता विहीन निर्माण कार्य अधिक दरों पर जिला प्रशासन भाजपा के लोगों से करा रहा है। उन पर कार्रवाई भी नहीं होती। मनरेगा और अन्य विकास कार्य के अभाव में लोग पलायन कर रहे हैं। लाल पानी से लोगों को राहत नहीं मिली है। क्षेत्र की समस्याओं को लगातार विधानसभा और जिला प्रशासन के समक्ष रखा जाता है। जिले की कई सड़कों के निर्माण और रोजगार के लिए जिला प्रशासन को कहा जा रहा है। दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय के मुख्य मार्ग में रेलवे ओवरब्रिज की मांग लंबित है। डीएमएफ और सीएसआर मद की राशि का भाजपाकरण कर दिया गया है। जिला हॉस्पिटल सहित अन्य भवनों की मरम्मत के नाम पर बार- बार तोड़फोड़ और निर्माण में करोड़ों रुपए फूंके जा रहे हैं। मेरे प्रयास से अंदरूनी अनेक बसाहट तक बिजली और पानी की व्यवस्था हुई, लेकिन सड़कों की हालत जर्जर है। कई इलाके ऐसे हैं, जो बरसात के दौरान टापू बन जाते हैं। चार माह के राशन की व्यवस्था बारिश से पहले करनी पड़ती है। - देवती कर्मा- विधायक
- भाजपा विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ी थी और सरकार दंतेवाड़ा में विकास कार्य करवा रही है। चुनाव हारने के बाद भी हम आम लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के साथ सड़क, बिजली और पानी मुहैया कराने में पीछे नहीं हैं। भाजपा और मेरा सीधा संबंध जनता से है। इसलिए प्रशासन और मंत्रियों से मिलकर जनहित के कार्य क्षेत्र में करवा रहे हैं। सूखा राहत देने के साथ ही रोजगारमूलक कार्यों का सृजन कराया जा रहा है। कांग्रेसी विधायक चुनावी साल में दौरा कर रही हैं। सरकार की योजनाओं को अपनी उपलब्धि बताकर ग्रामीणों को बरगलना शुरू कर दिया है। मैं विधायक होता तो क्षेत्र में विकास कार्य और तेजी से होते। - - भीमा मंडावी, भाजपा प्रत्याशी, 2013
मतदाताओं का गणित
कुल वोटर - 1,86,422
महिला - 97,123
पुरुष - 89,299
मतदान केंद्र - 272
ढाई दशक में केवल एक बार जीती भाजपा
वाम दलों और कांग्रेस के दबदबे वाली इस सीट पर ढाई दशक में भाजपा केवल एक ही बार जीत पाई है। 1993 में भाकपा के नंदाराम सोरी यहां से विधायक थे। 1998 में बस्तर टाइगर के नाम से प्रसिद्ध कांग्रेस के महेन्द्र कर्मा ने जीत दर्ज की। उन्होंने भाकपा के अर्जुन सिंह कुंजाम को हराया। 2003 में कर्मा को सीपीआई के टिकट से मैदान में उतरे पूर्व विधायक नंदाराम सोरी ने टक्कर दी। सोरी हार गए। 2008 के चुनाव में भाजपा के भीमा मंडावी ने कम्प्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (एम) के मनीष कुंजाम को हराया। 55.6 फीसद मतदान हुआ। मंडावी के हिस्से में 38 फीसदी वोट आए, जबकि कुंजाम केवल 26 फीसद वोट हासिल कर पाए। 2013 के चुनाव में कांग्रेस ने मंडावी को टक्कर देने के लिए स्वर्गीय कर्मा की पत्नी देवती कर्मा को मैदाने में उतारा। मतदान 62 फीसद के पार पहुंचा और मंडावी करीब छह हजार वोट से हार गए। उन्हें करीब 36 फीसद वोट मिला, जबकि देवती कर्मा ने लगभग 42 फीसद वोट हासिल किया।
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