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प्याज की 'राजनीति' में उलझी 'कृषि और अर्थनीति' भी नाकाम

इंदौर। किसान आंदोलन से डरी प्रदेश सरकार ने आनन-फानन में पूरे प्रदेश में प्याज की सरकारी खरीदी शुरू करा दी, पर किसानों को साधने की राजनीति में सरकार अर्थनीति भी भूल गई। राजनीति कितनी सधेगी, ये तो बाद में पता चलेगा, लेकिन अर्थ का कितना नुकसान होगा, ये साफ दिख रहा है। आठ स्र्पए किलो का प्याज अब सरकार को 19 स्र्पए में पड़ने वाला है। यही प्याज जब टेंडर निकालकर खुले बाजार में व्यापारियों को बेचा जा रहा है तो इसकी कीमत केवल 2 से 3 स्र्पए प्रति किलो ही मिल रही है।
प्रदेश में अब तक 400 करोड़ का 5 लाख मीट्रिक टन से अधिक प्याज खरीदा जा चुका है। विशेषज्ञ बताते हैं कि मंडी, गोदाम और रेलवे रैक पर बार-बार बोरियां पटकने, बारिश का पानी लगने से 30 फीसदी प्याज खराब हो जाता है। प्याज का रकबा, उत्पादन और भंडारण व्यवस्था को लेकर भी सरकारी विभागों के सारे अनुमान फेल हो चुके हैं। इस समय मध्य प्रदेश में प्याज का रकबा 1.37 लाख हेक्टेयर बताया जा रहा है।
पिछले साल के 1.40 लाख हेक्टेयर के मुकाबले ये कम है, लेकिन उत्पादन अधिक हो रहा है। पिछले साल 32.54 लाख मीट्रिक टन प्याज हुआ था, जबकि इस साल कम रकबे के बावजूद 34.46 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का अनुमान है। प्याज की ये इफरात सरकार के लिए मुसीबत बनकर आई है। इस समय प्रदेश में प्रशासन, मार्कफेड, नागरिक आपूर्ति निगम, वेयर हाउसिंग कॉर्पोरेशन के अधिकारियों से लेकर कलेक्टर, एसडीएम सभी प्याज की खरीदी, ट्रांसपोर्टेशन और भंडारण की माथापच्ची में लगे हैं।
ये है प्याज की राजनीति 
- मंडियों में प्याज की गिरते दामों से चिंतित किसानों ने आंदोलन के दौरान एक मांग ये रखी थी कि प्याज की खरीदी समर्थन मूल्य पर की जाए।
- हिंसक होते आंदोलन और विपक्ष के हमलों के दबाव में प्रदेश सरकार ने आनन-फानन में 8 स्र्पए प्रति किलो में प्याज की सरकारी खरीदी शुरू करा दी।
- समर्थन मूल्य पर खरीदा गया प्याज सार्वजनिक वितरण प्रणाली की राशन दुकानों से आम जनता को 2 स्र्पए किलो में बेचा जाएगा। साथ ही व्यापारियों के लिए खुली नीलामी भी की जाएगी।
यहां गड़बड़ाई कृषि नीति
- देश में सर्वाधिक प्याज महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र में होती है। मध्य प्रदेश में सर्वाधिक प्याज यहीं से आता था, लेकिन पिछले कुछ सालों में मप्र के किसानों ने भी प्याज को मुनाफे का सौदा मानते हुए इसका रकबा बढ़ा दिया।
- रकबे और उत्पादन के आंकड़ों को लेकर सरकार के दो विभागों में भी विरोधाभास है। राजस्व विभाग और उद्यानिकी विभाग के रकबे में अंतर आ रहा है। दोनों विभाग अब तक पुराने आंकड़ों से काम चला रहे हैं, जबकि धरातल पर तस्वीर बदल चुकी है।
- इंदौर जिला इसकी बानगी है। यहां राजस्व विभाग प्याज का रकबा 8 हजार हेक्टेयर बताता है। वास्तव में ये 17 हजार हेक्टेयर पर आ चुका है।
- पिछले सालों में प्याज की पैदावार 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रही, लेकिन इस साल 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हो रहा है।
ऐसे चरमराएगी अर्थनीति (मार्कफेड, वेयर हाउसिंग कॉर्पोरेशन और नागरिक आपूर्ति निगम के एक्सपर्ट के अनुसार)
- प्याज की सरकारी खरीदी 800 स्र्पए प्रति क्विंटल पर हो रही है। मार्केटिंग फेडरेशन और जिन सहकारी संस्थाओं के जरिये खरीदी होगी, उन्हें मिलने वाले कमीशन के बाद इसकी कीमत 825 स्र्पए प्रति क्विंटल हो जाएगी।
- ट्रांसपोर्ट एजेंसियों के जरिये मध्य प्रदेश नागरिक आपूर्ति निगम खरीदे गए प्याज का परिवहन कर रहा है। जब यह प्याज गोदाम या वेयर हाउस तक पहुंचाया जाएगा तो इस पर 400 स्र्पए प्रति क्विंटल का भाड़ा लग जाएगा। इस तरह प्याज की कीमत 1225 स्र्पए तक पहुंच जाएगी।
- वेयर हाउस में प्याज रखने का एक महीने का किराया 6.60 स्र्पए प्रति क्विंटल होगा। तब प्याज की कीमत 1232 स्र्पए पर चली जाएगी।
- वेयर हाउस से राशन दुकानों तक प्याज भेजने पर 400 स्र्पए प्रति क्विंटल का ट्रांसपोर्टेशन खर्च फिर लगने की संभावना है। इस तरह प्याज की कीमत 1632 स्र्पए प्रति क्विंटल पर चली जाएगी।
- जानकारों के मुताबिक प्याज भंडारण के लिए सूखी, खुली और हवादार जगह चाहिए। मप्र वेयर हाउसिंग और लॉजिस्टिक कॉर्पोरेशन प्याज का भंडारण वेयर हाउसों में कर रहा है। यहां एक-दो महीने प्याज रही तो 25 से 30 प्रतिशत प्याज खराब होने के आसार हैं।
- यानी प्रति क्विंटल 240 स्र्पए का नुकसान होगा। इसे मिलाने पर प्याज की कीमत 1872 स्र्पए प्रति क्विंटल पर जाएगी। राशन दुकानों से प्याज बेचने पर पिछले साल उनको 30 स्र्पए प्रति क्विंटल का कमीशन दिया गया था। यदि पिछले साल के कमीशन रेट ही जोड़े जाएं तो कमीशन सहित प्याज की कीमत 1902 स्र्पए हो जाएगी।
- मंडी प्रांगण में प्याज की खरीदी-बिक्री हो रही है। इसलिए मंडी समिति टैक्स भी ले सकती है। बहरहाल, यह टैक्स लिया जाएगा या नहीं, इसका फैसला सरकार करेगी। यदि मंडी टैक्स और कुछ अन्य छिपे खर्च भी इसमें शामिल हुए तो सरकार को प्याज खरीदी और महंगी पड़ेगी।
सर्वे ठीक से नहीं हो पाया
उद्यानिकी विभाग में स्टाफ की कमी है, इसलिए राजस्व विभाग के सर्वे पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ये सर्वे ठीक से नहीं हो पाया। मौसम अनुकूल होने से पिछले साल की तुलना में इस बार प्याज की पैदावार भी अधिक हुई। इसका सही अनुमान नहीं लगाया जा सका। अगले वर्ष से प्याज और अन्य उद्यानिकी फसलों के रकबे को लेकर मोबाइल एप भी बनाया जाएगा। किसान खुद भी इस पर अपनी फसल के क्षेत्रफल की जानकारी डाल सकेंगे।
- सत्यानंद, आयुक्त एवं संचालक, उद्यानिकी विभाग
ज्यादा दिन वेयर हाउस में नहीं रखेंगे
समर्थन मूल्य पर खरीदी गई प्याज इस बार अधिक दिनों तक वेयर हाउस में नहीं रखी जाएगी। इसलिए खराब होने की संभावना नहीं रहेगी। प्याज राशन दुकानों के जरिये जनता तक पहुंचाएंगे और व्यापारियों के लिए भी नीलामी की जाएगी। इसके लिए शासन ने पूरी योजना बनाई है।
- ज्ञानेश्वर पाटिल, एमडी, एमपी स्टेट मार्केटिंग को-ऑपरेटिव फेडरेशन
किसान को एमएसपी मिलना चाहिए, सरकार को घाटा हो तो हो
(सोमपाल शास्त्री, मप्र राज्य योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष)
प्याज ही नहीं गेहूं, दलहन और सोयाबीन में भी सरकार किसानों को उचित मूल्य नहीं दिलवा पा रही है। मध्यप्रदेश ही नहीं देश की कई मंडियों में किसान की उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे बिकती है। जब सरकार एमएसपी लागू ही नहीं करवा सकती तो हर साल इसे घोषित करने का ढोंग क्यों करती है। सरकारी तंत्र, कृषि विश्वविद्यालय, भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र, कृषि विज्ञान केंद्र और इनसे जुड़े सरकारी विभाग ही किसान को उत्पादन बढ़ाने की सलाह देते हैं। प्याज का उत्पादन बढ़ा है तो इसको खरीदने में सरकार को 19 स्र्पए से ऊपर भी खर्च हो रहा हो और घाटा हो तो हो, इसमें किसान कुछ नहीं कर सकता। इसी किसान के उत्पादन के दम पर मध्यप्रदेश सरकार ने पांच बार कृषि में पुरस्कार लिए हैं। किसान के पास ऐसा कोई मैकेनिज्म नहीं कि वह पता लगा सके कि उसे इस साल कितना उत्पादन करना है।
सरकार को ही अपनी नीतियों में सुधार करना होगा। मंडियों की खरीदी में सुधार लाना होगा। इस मामले में केंद्र सरकार भी उतनी ही दोषी है। मध्यप्रदेश में गेहूं की बेहतर क्वालिटी को देखते हुए कुछ साल पहले प्रदेश सरकार ने एमएसपी की खरीदी पर 100 स्र्पए बोनस दिया था लेकिन मोदी सरकार ने आते ही इसे बंद करवा दिया।
भोपाल के आसपास इटारसी, होशंगाबाद, पिपरिया, गाडरवाड़ा में एमएसपी पर धान खरीदी को बंद करवा दिया। संविधान में कृषि को राज्यों का विषय कहा गया है, लेकिन केंद्र उनके अधिकार क्षेत्र में भी राज्यों को रोक रही है। किसान की दृष्टि से ये ठीक बर्ताव नहीं है।
मध्यप्रदेश में इतना प्याज होने लगा है कि आगे चलकर महाराष्ट्र भी पीछे छूट जाएगा। सरकार को खुद प्याज खरीदी में उतरने के बजाय समर्थन मूल्य के भाव का अंतर किसानों के खाते में सब्सिडी के रूप में देकर हट जाती तो ठीक रहता। प्याज का उत्पादन ही अधिक है तो हम भी अधिक रेट कहां से दे पाएंगे।
- मुरली हरियानी, अध्यक्ष, थोक लहसुन, आलू, प्याज व्यापारी संघ, इंदौर
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